Extracts from my mom’s diary

On this Mother’s Day, sharing extracts from my mom’s diary. Her journey through cancer and how the mind won over disease. This is as is taken, no word changed, and most of it is in Hindi. I can’t describe the emotions that I went through while copying this. It is a story of hope that overcomes depression. I love you Mom.

25 May, 2008, Noida

कठिन रोग-ग्रस्त अवसादमय मन लेकर जब मैं हताशा के समुद्र में डूबती उबर रही थी, झिलमिल ने मेरे हाथो में कागज क़लम थमा दिया – “माँ, जो तुम्हारे मन में भाव आए, उसे कागज में उँडेल दो, भाषा की चिन्ता मत करो। मन की भावनाओं को दबा कर मत रखो ।

डायरी लिखने की आदत मेरी पहले भी थी। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे लिखने की इच्छा ही नहीं हो रही थी।

समय जैसे ठहर सा गया था। समय एक सूनी सड़क की तरह मेरे सामने फैला हुआ था।आगे बढ़ने का मेरे पास कोई रास्ता नही था। रात, आधी रात, भोर, सुबह, फिर दोपहर, लम्बी शाम काटे नही कटते।

बीच बीच में उठकर बैठना, फिर लेट जाना यही क्या मेरी नियति थी? Condemned cell में जीवन यापन करने वाले कैदी की जिंदगी? निर्वासित यक्ष जो हमेशा अल्का पुरी की याद में डूबा रहता था, की तरह, मैं केवल पुराने दिनों को याद करती रहती थी। पुराने मतलब, बहुत पुराने, बचपन की यादें, जवानी की भूलें, पुराने गानों के बोल, पुरानी फिल्में याद आते रहते।

30 May, 2008

कल मेरा जन्मदिन था। मेरा जन्मदिन हमेशा ही बेरंग, बिना उत्साह के, बिना किसी समारोह के आता है, और चुपचाप बिना आवाज़ किये चला जाता है। आखिर जन्मदिन का मतलब तो यही है कि मैं मृत्युदिन के थोड़े और करीब आ गयी हूँ। कुछ कोषाणु अपने ही शरीर में आतंकवादियों कि तरह आतताई बन जाते हैं और स्वयं उसी को नष्ट करने में लग जाते हैं। युद्ध! महायुद्ध! महारोग से युद्ध! रुग्न अंग काट के निकाल दो, जहर से शरीर को भर दो ताकि वह विषाक्त अणु नष्ट हो जाये, फिर भयंकर किरणों से उस भाग को दग्ध कर दो। कभी समझ में नहीं आया कि रोग अधिक दारुण हैं कि उसका उपचार।

15 June, 2008

पूरा सप्ताह प्रिंटआउट पढ़ने में लगाया। कैंसर के स्टेज, कैंसर रोगी के जीवन की अवधि, इसके कारण व उपचार। क्षतविक्षत अंग, केशहीन सिर, दुर्बल शक्तिहीन शरीर। यह जगत हैं स्वाभाविक स्वस्थ स्त्रियों का, पर हमारा संसार दूसरा हैं जहाँ हम अस्पतालों में हारे हुए जुआरी सा चेहरा लेकर डॉक्टर का इंतज़ार करते रहते हैं।

20 July 2008

इस विपदा में भगवान को याद करना, प्रार्थना करना, कुछ अवसरवादी सा नहीं लगेगा क्या? बाहरी मंदिर में कभी पूजा पाठ, जप-तप नहीं किया। पुकारे भी तो किसको पुकारे,  श्रीकृष्ण, संतोषी माँ, काली माता, या शिवजी ? क्या यह सचमुच कर्मफल हैं? क्या मैं आत्महत्या कर लू? किसी भी तरह, पानी में डूबकर, फांसी लगाकर? मगर फांसी लगाने लायक पटुता भी मुझमे नहीं हैं। भगवान् के सामने असंख्य आवेदनपत्र हैं, क्या मेरी वाली अस्पष्ट पुकार वैकुण्ठ या कैलाश तक पहुंच पायेगी?

30 July 2008

मेरी बीमारी ने मेरा सारा ध्यान ले लिया हैं। मुझे इसके आगे किसी की परवाह नहीं हैं, चाहे किसी राष्ट्र पर बम गिरे या आतंकवादी बम फेंके। बाढ़, तूफ़ान, भूकम्प, यह सब मेरे दुःख के आगे नगण्य हो गए हैं। मुझे हमेशा, हर क्षण अपने अलगाव, अपनी पृथकता का बोध होता हैं। मैं सबसे अलग हूँ।

4 August 2008

अब मैं नकारने की स्टेज से आगे आ गयी हूँ, स्वीकारने पर। जैसा भी रोग हैं, अब तो उससे जूझना ही पढ़ेगा। जोधपुर से रोज़ दोस्तों के फ़ोन आ रहे हैं। सब सचकित हैं. सशंकित हैं, दुखी हैं। “ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर” सिद्धांत पर जीवन यापन करने वाली, स्वच्छ, राग द्वेष से परे, जीवन व्यतीत करने वाली मैं उनके शुभ कामनाओ  के भार से दबी जा रही हूँ। क्या सब लोग मुझे इतना चाहते हैं, यह तो मैं जानती भी नहीं थी।

सोचती हूँ मैं अकेली ही दुखियारी नहीं हूँ। मुझसे भी बदतर लोग हैं। यदि मुझमे यह बीमारी सहन करने की शक्ति नहीं होती तो भगवान् मुझे यह रोग नहीं देता। यह मेरी परीक्षा का समय हैं। मुझे इसमें उत्तीर्ण होना ही होगा। यदि दो चार वर्ष और जीवन ही हैं तो उसे हंस हंसकर ही व्यतीत करुँगी। लोगो की करूणा या दयापूर्ण दृष्टि मुझे सहन नहीं होगी। मैं फिर सीधी खडी होकर माथा ऊँचा करके चलूँगी। किसी अज्ञात कवि की इस कविता ने मुझे सहारा दिया


I asked the Lord for a bunch of fresh flowers but instead he gave me ugly cactus with many thorns

I asked the Lord for some beautiful butterflies but instead he gave me many ugly and dreadful worms

I was threatened, I was disappointed, I mourned.

But after many days suddenly I saw the cactus bloom with many beautiful flowers flying in the spring wind.

God’s way is the best way.

थी कभी चाँद तक अपनी उड़ान
अब ये धूल ये सड़क अपना जहान

 

maa