The waiting room

Reminds you of the railway station, the crowd and cacophony, the chai and the stink. Train whistles, the incomprehensible announcements and the strain to listen for your own train. But this is a different waiting room.

Here only those people wait, whose trains have derailed, or are about to. They are trying to repair the tracks, push and pull to get the train back on track and somehow make it run, so they can leave for home. A few never do. 

Here they dont say ” train no so and so has arrived on platform number so and so.” Here it is ” Bed no 102″ and Kamble and Banerjee, the names and the numbers, and the call to feed or meet the doctor or sign something you have not read.

I am in the waiting room of an ICU. All around me is chaos. Sea of people, waiting to catch a glimpse of their loved ones, waiting for that ray of hope, that word from the doctor that can change despair to a smile or bring a frown and a tear. Noisy, crying, sharing, yet so distant from it all. Hearing it all, but not absorbing.

Hospitals are a part of life. And death. I am at the same place I was slightly more than two years ago. Same hospital, same ICU, same waiting room. I lost Baba here. He was already lost, but here I lost his physical being. All around me are faces, in despair, but still hopeful as they cross the nights of nightmares. 

When you think it cant get any worse, it does. And we get used to that and then there is a new low. How much the human mind can accept and get on with life, feels like a trial and error test.

Why does she have to suffer so much? In the past so many years, I have seen her lose her speech and her smile, her walk and her zest for life. A vegetable, that breathes and swallows, with a beating heart. That is about it. Just pain and more pain, which she doesn’t feel, or maybe feels and does not  express. Cancers, and then free from cancers. But not from this hell called dependence. Not from this journey that is a constant struggle for survival.

Who will I take home from here, a whole being or a part? A person who always smiled at me, now closes her eyes and shrinks away as I talk to her, or touch her.

Do your job, dont worry about the consequences. I was reminded today. Do your best, dont expect anything. Maybe that is the learning. And emotions? That are ready to flow, that have to be pushed back because there is so much to be done.

I try to work. In an effort to remain sane. Not break. I have to be strong and stronger, specially when I am powerless. Someone else pulls the strings and we dance. I do- the biggest fallacy. Who are we? Who am I? My face is expressionless, as I listen to the doctor’s verdict. Impassive but with a storm inside. 

Life sucks. Death sucks more. But maybe it is the end of suffering, pain and despair. But can’t it be painless? Among so much pain and pleasure, something goes on- that they call life, as it sits in the waiting room, for death. Somebody give respite from it all,  she needs to rest. In peace. 

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Extracts from my mom’s diary

On this Mother’s Day, sharing extracts from my mom’s diary. Her journey through cancer and how the mind won over disease. This is as is taken, no word changed, and most of it is in Hindi. I can’t describe the emotions that I went through while copying this. It is a story of hope that overcomes depression. I love you Mom.

25 May, 2008, Noida

कठिन रोग-ग्रस्त अवसादमय मन लेकर जब मैं हताशा के समुद्र में डूबती उबर रही थी, झिलमिल ने मेरे हाथो में कागज क़लम थमा दिया – “माँ, जो तुम्हारे मन में भाव आए, उसे कागज में उँडेल दो, भाषा की चिन्ता मत करो। मन की भावनाओं को दबा कर मत रखो ।

डायरी लिखने की आदत मेरी पहले भी थी। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे लिखने की इच्छा ही नहीं हो रही थी।

समय जैसे ठहर सा गया था। समय एक सूनी सड़क की तरह मेरे सामने फैला हुआ था।आगे बढ़ने का मेरे पास कोई रास्ता नही था। रात, आधी रात, भोर, सुबह, फिर दोपहर, लम्बी शाम काटे नही कटते।

बीच बीच में उठकर बैठना, फिर लेट जाना यही क्या मेरी नियति थी? Condemned cell में जीवन यापन करने वाले कैदी की जिंदगी? निर्वासित यक्ष जो हमेशा अल्का पुरी की याद में डूबा रहता था, की तरह, मैं केवल पुराने दिनों को याद करती रहती थी। पुराने मतलब, बहुत पुराने, बचपन की यादें, जवानी की भूलें, पुराने गानों के बोल, पुरानी फिल्में याद आते रहते।

30 May, 2008

कल मेरा जन्मदिन था। मेरा जन्मदिन हमेशा ही बेरंग, बिना उत्साह के, बिना किसी समारोह के आता है, और चुपचाप बिना आवाज़ किये चला जाता है। आखिर जन्मदिन का मतलब तो यही है कि मैं मृत्युदिन के थोड़े और करीब आ गयी हूँ। कुछ कोषाणु अपने ही शरीर में आतंकवादियों कि तरह आतताई बन जाते हैं और स्वयं उसी को नष्ट करने में लग जाते हैं। युद्ध! महायुद्ध! महारोग से युद्ध! रुग्न अंग काट के निकाल दो, जहर से शरीर को भर दो ताकि वह विषाक्त अणु नष्ट हो जाये, फिर भयंकर किरणों से उस भाग को दग्ध कर दो। कभी समझ में नहीं आया कि रोग अधिक दारुण हैं कि उसका उपचार।

15 June, 2008

पूरा सप्ताह प्रिंटआउट पढ़ने में लगाया। कैंसर के स्टेज, कैंसर रोगी के जीवन की अवधि, इसके कारण व उपचार। क्षतविक्षत अंग, केशहीन सिर, दुर्बल शक्तिहीन शरीर। यह जगत हैं स्वाभाविक स्वस्थ स्त्रियों का, पर हमारा संसार दूसरा हैं जहाँ हम अस्पतालों में हारे हुए जुआरी सा चेहरा लेकर डॉक्टर का इंतज़ार करते रहते हैं।

20 July 2008

इस विपदा में भगवान को याद करना, प्रार्थना करना, कुछ अवसरवादी सा नहीं लगेगा क्या? बाहरी मंदिर में कभी पूजा पाठ, जप-तप नहीं किया। पुकारे भी तो किसको पुकारे,  श्रीकृष्ण, संतोषी माँ, काली माता, या शिवजी ? क्या यह सचमुच कर्मफल हैं? क्या मैं आत्महत्या कर लू? किसी भी तरह, पानी में डूबकर, फांसी लगाकर? मगर फांसी लगाने लायक पटुता भी मुझमे नहीं हैं। भगवान् के सामने असंख्य आवेदनपत्र हैं, क्या मेरी वाली अस्पष्ट पुकार वैकुण्ठ या कैलाश तक पहुंच पायेगी?

30 July 2008

मेरी बीमारी ने मेरा सारा ध्यान ले लिया हैं। मुझे इसके आगे किसी की परवाह नहीं हैं, चाहे किसी राष्ट्र पर बम गिरे या आतंकवादी बम फेंके। बाढ़, तूफ़ान, भूकम्प, यह सब मेरे दुःख के आगे नगण्य हो गए हैं। मुझे हमेशा, हर क्षण अपने अलगाव, अपनी पृथकता का बोध होता हैं। मैं सबसे अलग हूँ।

4 August 2008

अब मैं नकारने की स्टेज से आगे आ गयी हूँ, स्वीकारने पर। जैसा भी रोग हैं, अब तो उससे जूझना ही पढ़ेगा। जोधपुर से रोज़ दोस्तों के फ़ोन आ रहे हैं। सब सचकित हैं. सशंकित हैं, दुखी हैं। “ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर” सिद्धांत पर जीवन यापन करने वाली, स्वच्छ, राग द्वेष से परे, जीवन व्यतीत करने वाली मैं उनके शुभ कामनाओ  के भार से दबी जा रही हूँ। क्या सब लोग मुझे इतना चाहते हैं, यह तो मैं जानती भी नहीं थी।

सोचती हूँ मैं अकेली ही दुखियारी नहीं हूँ। मुझसे भी बदतर लोग हैं। यदि मुझमे यह बीमारी सहन करने की शक्ति नहीं होती तो भगवान् मुझे यह रोग नहीं देता। यह मेरी परीक्षा का समय हैं। मुझे इसमें उत्तीर्ण होना ही होगा। यदि दो चार वर्ष और जीवन ही हैं तो उसे हंस हंसकर ही व्यतीत करुँगी। लोगो की करूणा या दयापूर्ण दृष्टि मुझे सहन नहीं होगी। मैं फिर सीधी खडी होकर माथा ऊँचा करके चलूँगी। किसी अज्ञात कवि की इस कविता ने मुझे सहारा दिया


I asked the Lord for a bunch of fresh flowers but instead he gave me ugly cactus with many thorns

I asked the Lord for some beautiful butterflies but instead he gave me many ugly and dreadful worms

I was threatened, I was disappointed, I mourned.

But after many days suddenly I saw the cactus bloom with many beautiful flowers flying in the spring wind.

God’s way is the best way.

थी कभी चाँद तक अपनी उड़ान
अब ये धूल ये सड़क अपना जहान

 

maa